Nagarjun

  1. मैंने देखा :
    दो शिखरों के अन्तराल वाले जँगल में
    आग लगी है …
    बस अब ऊपर की मोड़ों से
    आगे बढ़ने लगी सड़क पर
    मैंने देखा :
    धुआँ उठ रहा
    घाटी वाले
    खण्डित-मण्डित अन्तरिक्ष में
    मैंने देखा : आग लगी है
    दो शिखरों के अन्तराल वाले जँगल में ।
    मैंने देखा : शिखरों पर
    दस-दस त्रिकूट हैं
    यहाँ-वहाँ पर चित्र-कूट हैं
    दाएँ-बाएँ तलहटियों तक
    फैले इनके जटा-जूट हैं
    सूखे झरनों के निशान हैं
    तीन पथों में बहने वाली
    गँगा के महिमा-बखान हैं
    दस झोपड़ियाँ, दो मकान हैं
    इनकी आभा दमक रही है
    इनका चूना चमक रहा है
    इनके मालिक वे किसान हैं
    जिनके लड़के मैदानों में
    युग की डाँट-डपट सहते हैं
    दफ़्तर में भी चुप रहते हैं ।
  2. झुकी पीठ को मिला
    किसी हथेली का स्पर्श
    तन गई रीढ़
    महसूस हुई कन्धों को
    पीछे से,
    किसी नाक की सहज उष्ण निराकुल साँसें
    तन गई रीढ़
    कौंधी कहीं चितवन
    रंग गए कहीं किसी के होठ
    निगाहों के ज़रिये जादू घुसा अन्दर
    तन गई रीढ़
    गूँजी कहीं खिलखिलाहट
    टूक-टूक होकर छितराया सन्नाटा
    भर गए कर्णकुहर
    तन गई रीढ़
    आगे से आया
    अलकों के तैलाक्त परिमल का झोंका
    रग-रग में दौड़ गई बिजली
    तन गई रीढ़
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