Sudama Pandey “Dhoomil”

  1. शब्द किस तरह
    कविता बनते हैं
    इसे देखो
    अक्षरों के बीच गिरे हुए
    आदमी को पढ़ो
    क्या तुमने सुना कि यह
    लोहे की आवाज़ है या
    मिट्टी में गिरे हुए ख़ून
    का रंग।
    लोहे का स्वाद
    लोहार से मत पूछो
    घोड़े से पूछो
    जिसके मुंह में लगाम है।
  2. हवा गरम है
    और धमाका एक हलकी-सी रगड़ का
    इंतज़ार कर रहा है
    कठुआये हुए चेहरों की रौनक
    वापस लाने के लिए
    उठो और हरियाली पर हमला करो
    जड़ों से कहो कि अंधेरे में
    बेहिसाब दौड़ने के बजाय
    पेड़ों की तरफदारी के लिए
    ज़मीन से बाहर निकल पड़े
    बिना इस डर के कि जंगल
    सूख जाएगा
    यह सही है कि नारों को
    नयी शाख नहीं मिलेगी
    और न आरा मशीन को
    नींद की फुरसत
    लेकिन यह तुम्हारे हक में हैं
    इससे इतना तो होगा ही
    कि रुखानी की मामूली-सी गवाही पर
    तुम दरवाज़े को अपना दरवाज़ा
    और मेज़ को
    अपनी मेज कह सकोगे।
  3. वहाँ न जंगल है न जनतंत्र
    भाषा और गूँगेपन के बीच कोई
    दूरी नहीं है।
    एक ठंडी और गाँठदार अंगुली माथा टटोलती है।
    सोच में डूबे हुए चेहरों और
    वहां दरकी हुई ज़मीन में
    कोई फ़र्क नहीं हैं।
    वहाँ कोई सपना नहीं है। न भेड़िये का डर।
    बच्चों को सुलाकर औरतें खेत पर चली गई हैं।
    खाये जाने लायक कुछ भी शेष नहीं है।
    वहाँ सब कुछ सदाचार की तरह सपाट
    और ईमानदारी की तरह असफल है।
    हाय! इसके बाद
    करम जले भाइयों के लिए जीने का कौन-सा उपाय
    शेष रह जाता है, यदि भूख पहले प्रदर्शन हो और बाद में
    दर्शन बन जाय।
    और अब तो ऐसा वक्त आ गया है कि सच को भी सबूत के बिना
    बचा पाना मुश्किल है।

  4. एक आदमी
    रोटी बेलता है
    एक आदमी रोटी खाता है
    एक तीसरा आदमी भी है
    जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
    वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
    मैं पूछता हूँ–
    ‘यह तीसरा आदमी कौन है ?’
    मेरे देश की संसद मौन है।

  5. सबसे अधिक हत्याएँ
    समन्वयवादियों ने की।
    दार्शनिकों ने
    सबसे अधिक ज़ेवर खरीदा।
    भीड़ ने कल बहुत पीटा
    उस आदमी को
    जिस का मुख ईसा से मिलता था।
    वह कोई और महीना था।
    जब प्रत्येक टहनी पर फूल खिलता था,
    किंतु इस बार तो
    मौसम बिना बरसे ही चला गया
    न कहीं घटा घिरी
    न बूँद गिरी
    फिर भी लोगों में टी.बी. के कीटाणु
    कई प्रतिशत बढ़ गए
    कई बौखलाए हुए मेंढक
    कुएँ की काई लगी दीवाल पर
    चढ़ गए,
    और सूरज को धिक्कारने लगे
    –व्यर्थ ही प्रकाश की बड़ाई में बकता है
    सूरज कितना मजबूर है
    कि हर चीज़ पर एक सा चमकता है।
    हवा बुदबुदाती है
    बात कई पर्तों से आती है—
    एक बहुत बारीक पीला कीड़ा
    आकाश छू रहा था,
    और युवक मीठे जुलाब की गोलियाँ खा कर
    शौचालयों के सामने
    पँक्तिबद्ध खड़े हैं।
    आँखों में ज्योति के बच्चे मर गए हैं
    लोग खोई हुई आवाज़ों में
    एक दूसरे की सेहत पूछते हैं
    और बेहद डर गए हैं।
    सब के सब
    रोशनी की आँच से
    कुछ ऐसे बचते हैं
    कि सूरज को पानी से
    रचते हैं।
    बुद्ध की आँख से खून चू रहा था
    नगर के मुख्य चौरस्ते पर
    शोकप्रस्ताव पारित हुए,
    हिजड़ो ने भाषण दिए
    लिंग-बोध पर,
    वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं
    आत्म-शोध पर
    प्रेम में असफल छात्राएँ
    अध्यापिकाएँ बन गई हैं
    और रिटायर्ड बूढ़े
    सर्वोदयी-
    आदमी की सबसे अच्छी नस्ल
    युद्धों में नष्ट हो गई,
    देश का सबसे अच्छा स्वास्थ्य
    विद्यालयों में
    संक्रामक रोगों से ग्रस्त है
    (मैंने राष्ट्र के कर्णधारों को
    सड़को पर
    किश्तियों की खोज में
    भटकते हुए देखा है)
    संघर्ष की मुद्रा में घायल पुरुषार्थ
    भीतर ही भीतर
    एक निःशब्द विस्फोट से त्रस्त है
    पिकनिक से लौटी हुई लड़कियाँ
    प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं
    सबसे अच्छे मस्तिष्क,
    आरामकुर्सी पर
    चित्त पड़े हैं।
Shopping Basket
error: Content is protected !!