Dushyant Kumar

  1. सत्य बतलाना
    तुमने उन्हें क्यों नहीं रोका?
    क्यों नहीं बताई राह?
    क्या उनका किसी देशद्रोही से वादा था?
    क्या उनकी आँखों में घृणा का इरादा था?
    क्या उनके माथे पर द्वेष-भाव ज्यादा था?
    क्या उनमें कोई ऐसा था जो कायर हो?
    या उनके फटे वस्त्र तुमको भरमा गए?
    पाँवों की बिवाई से तुम धोखा खा गए?
    जो उनको ऐसा ग़लत रास्ता सुझा गए।
    जो वे खता खा गए।
    सत्य बतलाना तुमने, उन्हें क्यों नहीं रोका?
    क्यों नहीं बताई राह?
    वे जो हमसे पहले इन राहों पर आए थे,
    वे जो पसीने से दूध से नहाए थे,
    वे जो सचाई का झंडा उठाए थे,
    वे जो लौटे तो पराजित कहाए थे,
    क्या वे पराए थे?
    सत्य बतलाना तुमने, उन्हें क्यों नहीं रोका?
    क्यों नहीं बताई राह?
  2. संस्कारों की अरगनी पर टंगा
    एक फटा हुआ बुरका
    कितना प्यारा नाम है उसका-देश,
    जो मुझको गंध
    और अर्थ
    और कविता का कोई भी
    शब्द नहीं देता
    सिर्फ़ एक वहशत,
    एक आशंका
    और पागलपन के साथ,
    पौरुष पर डाल दिया जाता है,
    ढंकने को पेट, पीठ, छाती और माथा।
  3. एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है,
    आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है।
    ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,
    यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है।
    एक बूढा आदमी है मुल्क में या यों कहो,
    इस अँधेरी कोठारी में एक रौशनदान है।
    मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,
    तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है।
    इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब की सदके आपके
    जब से आज़ादी मिली है, मुल्क में रमजान है।
    कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
    मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है।
    मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ,
    हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।
  4. ये सच है कि पाँवों ने बहुत कष्ट उठाए
    पर पाँवों किसी तरह से राहों पे तो आए
    हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था
    कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए
    जैसे किसी बच्चे को खिलोने न मिले हों
    फिरता हूँ कई यादों को सीने से लगाए
    चट्टानों से पाँवों को बचा कर नहीं चलते
    सहमे हुए पाँवों से लिपट जाते हैं साए
    यों पहले भी अपना—सा यहाँ कुछ तो नहीं था
    अब और नज़ारे हमें लगते हैं पराए.
  5. मेरी प्रगति या अगति का
    यह मापदण्ड बदलो तुम,
    जुए के पत्ते-सा
    मैं अभी अनिश्चित हूँ ।
    मुझ पर हर ओर से चोटें पड़ रही हैं,
    कोपलें उग रही हैं,
    पत्तियाँ झड़ रही हैं,
    मैं नया बनने के लिए खराद पर चढ़ रहा हूँ,
    लड़ता हुआ
    नई राह गढ़ता हुआ आगे बढ़ रहा हूँ ।
    अगर इस लड़ाई में मेरी साँसें उखड़ गईं,
    मेरे बाज़ू टूट गए,
    मेरे चरणों में आँधियों के समूह ठहर गए,
    मेरे अधरों पर तरंगाकुल संगीत जम गया,
    या मेरे माथे पर शर्म की लकीरें खिंच गईं,
    तो मुझे पराजित मत मानना,
    समझना –
    तब और भी बड़े पैमाने पर
    मेरे हृदय में असन्तोष उबल रहा होगा,
    मेरी उम्मीदों के सैनिकों की पराजित पंक्तियाँ
    एक बार और
    शक्ति आज़माने को
    धूल में खो जाने या कुछ हो जाने को
    मचल रही होंगी ।
    एक और अवसर की प्रतीक्षा में
    मन की क़न्दीलें जल रही होंगी ।
    ये जो फफोले तलुओं मे दीख रहे हैं
    ये मुझको उकसाते हैं ।
    पिण्डलियों की उभरी हुई नसें
    मुझ पर व्यंग्य करती हैं ।
    मुँह पर पड़ी हुई यौवन की झुर्रियाँ
    क़सम देती हैं ।
    कुछ हो अब, तय है –
    मुझको आशंकाओं पर क़ाबू पाना है,
    पत्थरों के सीने में
    प्रतिध्वनि जगाते हुए
    परिचित उन राहों में एक बार
    विजय-गीत गाते हुए जाना है –
    जिनमें मैं हार चुका हूँ ।
    मेरी प्रगति या अगति का
    यह मापदण्ड बदलो तुम
    मैं अभी अनिश्चित हूँ ।
  6. जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,
    अब तो पथ यही है|
    अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
    एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
    यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
    क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
    अब तो पथ यही है |
    क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
    एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
    एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए,
    आज हर नक्षत्र है अनुदार,
    अब तो पथ यही है.
    यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
    यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
    यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
    कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
    अब तो पथ यही है. 
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