- हमन हैं इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या।
रहें आजाद या जग में, हमन दुनियाँ से यारी क्या।।
जो बिछुरे हैं पियारे से, भटकते दरबदर फिरते।
हमारा यार है हम में, हमन को इंतजारी क्या।।
खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है।
हमन गुरु नाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या।।
न पल बिछुरे पिया हम से, न हम बिछुरे पियारे से।
उन्ही से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या।।
कबीरा इश्क को माता, दुई को दूर कर दिल से।
जो चलना राह नाजुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या।। - प्रीत पुरानी न होत है, जो उत्तम से लाग।
सो बरसां जल मे रहै, पाथर न छोड़े आग।। - प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा सो रुचै, शीश देय ले जाय।। - प्रेम पियाला सो पिये, शीश दक्षिना देय।
लोभी शीश न दे सकै, नाम प्रेम का लेय।। - प्रेमी ढूँढत मैं फिरूँ, प्रेमी मिलै न कोय।
प्रेमी सो प्रेमी मिलै, विष से अमृत होय।। - जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जानु मसान।
जैसे खाल लोहार की, सांस लेत बिनु प्रान।। - कामी का गुरु कामिनी, लोभी का गुरु दाम।
कबीर का गुरु सन्त है, संतन का गुरु राम।। - माया माया सब कहैं, माया लखै न कोय।
जो मन से ना ऊतरे, माया कहिए सोय।। - मूँड मुँड़ाये हरि मिले, सब कोय लेय मुड़ाय।
बार बार के मूँडते, भेड़ न बैकुंठ जाय।। - मन लागा राम फकीरी में।
जो सुख देखा राम भजन में, सो सुख नाहिं अमीरी में।
भली बुरी सबकी सुनि लीजै, कर गुजरान गरीबी में।।
प्रेम नगर में रहनी हमारी, भल बनि आई सबूरी में।
जो रस होवै गागर निमुआ, सो रस नाहि जमीरी में।।
हाथ में कुंडी बगल में सोंटा, तीनों लोक जगीरी में।
कहहि कबीर सुनो भई साधो, साहब मिले गरीबी में।। - रहना नहिं देश वीराना है।।
यह संसार कागद की पुड़िया, बूंद पड़े घुल जाना है।
यह संसार कांटे की बाड़ी, उलझि उलझि मर जाना है।।
यह संसार झाड़ औ झाखड़, आग लगे जरि जाना है।
कहत कबीर सुनो भई साधो, सतगुरु नाम ठिकाना है।। - मुखड़ा क्या देखै दरपन में, दया धरम नहिं तन में।।
गहरी नदिया नाव पुरानी, उतरन चाहे छन में।
प्रेम की नइया पार उतर गई, पापी बुड़े जल में।।
दर्पण देखत मोछ मरोरत, लेत चुवत जुलफन में।
एक दिन ऐसा आन पड़ेगा, कागा नोचत बन में।।
मुखड़ा क्या देखै दरपन में, दया धरम नहिं तन में।।
आम की डार कोइलिया बोलै, सुगना बोले बन में।
घर वारी घरही में राजी, फक्कर राजी बन में।।
सुन्दर तिरिया वीरा लावै, सेवा चाहे अंग में।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, ई का लरिहैं रन में।।
मुखड़ा क्या देखै दरपन में, दया धरम नहिं तन में।। - संतों मानुष तन बौराना।।
इक बकरी का बच्चा लाये, ताहि खियावत दाना।
शीश काटि धरनी पर देवें, फिर माँगे वरदाना।।
घर ही में इक मानुष मरिगौ, उनको देख घिनाना।
जार फूक कोइला कर डारे, अवघट घाट नहाना।।
बाहर से इक मुरदा लाये, नोन तैल घी साना।
ता मुरदे की बनी रसोई, घर भर करत बखाना।।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, यह पद है निर्वाना।
यह पद की जो निन्दा करिहैं, ताको नरक निदाना।।
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