Meerabai

  1. चालाँ वाही देस प्रीतम पावाँ चलाँ वाही देस।
    कहो तो कुसुमल साड़ी रंगावाँ, कहो तो भगवा भेस॥
    कहो तो मोतियन माँग भरावाँ, कहो छिरकावाँ केस।
    मीरा के प्रभु गिरधर नागर, सुण गयो बिड़द नरेस॥
  2. सखी मेरी नींद नसानी हो।
    पिव के पंथ निहारत सिगरी रैन विहानी हो॥
    सब सखियन मिल सीख दई, मैं एक न मानी हो।
    बिन देखे कल नहीं परत, जिया ऐसी ठानी हो॥
    अंग छीन व्याकुल भई, मुख पिवपिव बानी हो।
    अंतर् वेदन विरह की वह पीर न जानी हो॥
    ज्यों चातक घन को रटै, मछरी जिमि पानी हो।
    मीरां व्याकुल विरहणी सुध बुध बिसरानी हो॥
  3. लगी मोहि राम खुमारी हो।
    रमझम बरसै मेहंड़ा भीजै तन सारी हो॥
    चहूँदिस चमकै दामणी गरजै घन भारी हो।
    सत गुरु भेद बताइया खोली भरम किवारी हो॥
    सब घट दीसै आतमा सबही सूँ न्यारी हो।
    दीपग जोऊँ ग्यान का चढूँ अगम अटारी हो।
    मीरा दासी राम की इमरत बलिहारी हो॥
  4. दरद की मारी मैं बन बन डोलूँ, मेरो दरद न जाने कोय।
    घायल की गति घायलया जाने, की जिन लाई होय।
    को विरहणी को दुख जाणे हो।
    जा घट विरहा सोई लखि है, कै कोई हरिजन मानै हो।
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