Ramdhari Singh Dinkar

  1. दो में से क्या तुम्हे चाहिए कलम या कि तलवार
    मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति विजय अपार
    अंध कक्ष में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गान
    या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान
    कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली,
    दिल की नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली
    पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे,
    और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे
    एक भेद है और वहां निर्भय होते नर -नारी,
    कलम उगलती आग, जहाँ अक्षर बनते चिंगारी
    जहाँ मनुष्यों के भीतर हरदम जलते हैं शोले,
    बादल में बिजली होती, होते दिमाग में गोले
    जहाँ पालते लोग लहू में हालाहल की धार,
    क्या चिंता यदि वहाँ हाथ में नहीं हुई तलवार
  2. स्वर्ग की जो कल्पना है,
    व्यर्थ क्यों कहते उसे तुम?
    धर्म बतलाता नहीं संधान यदि इसका?
    स्वर्ग का तुम आप आविष्कार कर लेते।
  3. आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा ?
    मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा ?
    आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं,
    पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं।
  4. हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देनेवाले,
    पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेनेवाले।
    इनके जादू का जोर भला कब तक बुभुक्षु सह सकता है ?
    है कौन, पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है ?
  5. झेलेगा यह बलिदान ? भूख की घनी चोट सह पाएगा ?
    आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप-सा घास चबा रह पाएगा ?
    है बड़ी बात आजादी का पाना ही नहीं, जुगाना भी,
    बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर-फिर दुहराना भी।
  6. सच है, विपत्ति जब आती है,
    कायर को ही दहलाती है,
    सूरमा नहीं विचलित होते,
    क्षण एक नहीं धीरज खोते,
    विघ्नों को गले लगाते हैं,
    काँटों में राह बनाते हैं।
    मुहँ से न कभी उफ़ कहते हैं,
    संकट का चरण न गहते हैं,
    जो आ पड़ता सब सहते हैं,
    उद्योग-निरत नित रहते हैं,
    शुलों का मूळ नसाते हैं,
    बढ़ खुद विपत्ति पर छाते हैं।
    है कौन विघ्न ऐसा जग में,
    टिक सके आदमी के मग में?
    ख़म ठोंक ठेलता है जब नर
    पर्वत के जाते पाव उखड़,
    मानव जब जोर लगाता है,
    पत्थर पानी बन जाता है।
    गुन बड़े एक से एक प्रखर,
    हैं छिपे मानवों के भितर,
    मेंहदी में जैसी लाली हो,
    वर्तिका-बीच उजियाली हो,
    बत्ती जो नहीं जलाता है,
    रोशनी नहीं वह पाता है।
  7. पुरुष वीर बलवान,
    देश की शान,
    हमारे नौजवान
    घायल होकर आये हैं।
    कहते हैं, ये पुष्प, दीप,
    अक्षत क्यों लाये हो?
    हमें कामना नहीं सुयश-विस्तार की,
    फूलों के हारों की, जय-जयकार की।
    तड़प रही घायल स्वदेश की शान है।
    सीमा पर संकट में हिन्दुस्तान है।
    ले जाओ आरती, पुष्प, पल्लव हरे,
    ले जाओ ये थाल मोदकों ले भरे।
    तिलक चढ़ा मत और हृदय में हूक दो,
    दे सकते हो तो गोली-बन्दूक दो।
  8. धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,
    कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।
    कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है;
    मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?
    दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,
    बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
    प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।
    चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।
    बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
    कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?
    मँझधार है, भँवर है या पास है किनारा?
    यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा?
    आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,
    भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।
    तम-बेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
    ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ।
    आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
    बल-पुँज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
    अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है,
    है रो रही जवानी, अन्धेर हो रहा है।
    निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है।
    निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
    पंचास्य-नाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
    जड़ता-विनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।
    मन की बँधी उमंगें असहाय जल रही हैं,
    अरमान-आरज़ू की लाशें निकल रही हैं।
    भीगी-खुली पलों में रातें गुज़ारते हैं,
    सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं।
    इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
    पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
    उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
    विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।
    आँसू-भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
    मेरे श्मशान में आ श्रृंगी जरा बजा दे;
    फिर एक तीर सीनों के आर-पार कर दे,
    हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
    आमर्ष को जगाने वाली शिखा नई दे,
    अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
    विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
    बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।
    ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
    जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।
    गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे।
    इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
    हम दे चुके लहू हैं, तू देवता विभा दे,
    अपने अनल-विशिख से आकाश जगमगा दे।
    प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ,
    तेरी दया विपद् में भगवान, माँगता हूँ।
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